एशियन टाइम्स | विशेष संवाददाता

भारतीय राजनीति में कई ऐसे संबंध रहे हैं जो विचारधारा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों और समय के समीकरणों से तय होते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प रिश्ता था—भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता और वर्तमान में उन्नाव से सांसद साक्षी महाराज तथा समाजवादी आंदोलन के महत्त्वपूर्ण स्तंभ रहे मुलायम सिंह यादव के बीच। दोनों भले ही अलग-अलग विचारधाराओं की राजनीति से आते हों, लेकिन कई वर्षों तक उनका राजनीतिक सहयोग और व्यक्तिगत समीकरण चर्चा का विषय रहा।
सहयोग की शुरुआत और राजनीतिक समीकरण
90 के दशक के अंत में जब साक्षी महाराज ने भारतीय जनता पार्टी से दूरी बनाकर समाजवादी पार्टी का दामन थामा, तब मुलायम सिंह यादव ने न सिर्फ उनका स्वागत किया बल्कि सपा की राजनीति में उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका भी दी। 1999–2000 के दौरान दोनों नेताओं के बीच निकटता बढ़ी और मुलायम सिंह ने साक्षी महाराज को राज्यसभा भेजने का फैसला लेकर यह संकेत दिया कि वे उन्हें सपा में एक मजबूत सामाजिक-राजनीतिक चेहरा बनाना चाहते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय मुलायम सिंह यादव हिंदुत्व-समर्थक वर्ग के कुछ पहचाने हुए चेहरों को जोड़कर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहते थे। साक्षी महाराज जैसे नेता उस रणनीति का स्वाभाविक हिस्सा बने।
विवाद के समय मुलायम का सार्वजनिक समर्थन
साल 2000 में साक्षी महाराज एक विवाद में घिरे। उस अवधि में मुलायम सिंह यादव खुले तौर पर उनके समर्थन में सामने आए और आरोपों को “राजनीतिक साजिश” बताया। यह कदम उनके राजनीतिक रिश्ते की मजबूती का बड़ा संकेत माना गया। उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार बताते हैं कि यह वह दौर था जब मुलायम सिंह यादव ने साक्षी महाराज को अपने निकट नेताओं की श्रेणी में शामिल किया था।
धीरे-धीरे पैदा हुए मतभेद
हालाँकि संबंधों में गर्मजोशी लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी। वर्ष 2002 के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने लगीं और साक्षी महाराज फिर भाजपा के करीब आने लगे। वैचारिक दूरी और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने दोनों के रिश्तों में ठंडापन लाना शुरू कर दिया। आने वाले वर्षों में दोनों नेता भिन्न राजनीतिक रास्तों पर चलते गए और उनके बीच कोई सक्रिय राजनीतिक संपर्क नहीं बचा।
राजनीति का यथार्थ: रिश्ते विचारधारा से ज़्यादा परिस्थितियों पर आधारित
राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि साक्षी महाराज और मुलायम सिंह यादव का संबंध भारतीय राजनीति की उस प्रकृति को उजागर करता है जहाँ व्यक्तिगत समीकरण और राजनीतिक ज़रूरतें विचारधारा पर भारी पड़ती हैं। दोनों नेताओं ने एक समय पर एक-दूसरे का समर्थन किया, साथ काम किया, लेकिन समय और मंच बदलते ही रास्ते भी अलग हो गए।